ओजोन परत का अपक्षय(Depletion of Ozone layer )
ओजोन परत का अपक्षय ( Depletion of Ozone layer ) -
हमारे वायुमंडल में उपस्थित महत्वपूर्ण ओजोन परत का हानिकारक गैसों के द्वारा अपक्षय होने की प्रक्रिया ओजोन परत का अपक्षय कहलाता है|
ओजोन परत पृथ्वी पर जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है परंतु हाल ही में इस सुरक्षा परत के अपक्षय की सूचनाएं हैं| इसका प्रमुख कारण मानव द्वारा वायुमंडल में लगातार ओजोन विघटनकारी पदार्थों (ODS) का छोड़ना है| नाइट्रिक ऑक्साइड तथा क्लोरोफ्लोरोकार्बन प्रमुख ओजोन विघटनकारी पदार्थ हैं|
पृथ्वी की सतह पर मनुष्यों की विभिन्न क्रियाओं जैसे जीवाश्म ईंधन का अत्यधिक प्रयोग आदि तथा प्राकृतिक स्रोतों से NO निरमुक्त होती है| साथ ही सुपर सोनिक प्लेन समताप मंडल में अत्यधिक मात्रा में NO निरमुक्त करते हैं | NO ओजोन को डाईऑक्सीजन में बदल देते हैं|
NO + O3 -----> NO2 + O2
उत्पन्न NO2 ऑक्सीजन से अभिक्रिया करके दोबारा NO बनाती है -
NO2 + O -----> NO + O2
इस प्रकार ओजोन का अपक्षय होता रहता है और NO भी पुनरुत्पादित होती रहती है|
ओजोन परत के क्षय का दूसरा कारण क्लोरोफ्लोरोकार्बन यौगिकों का उत्सर्जन है| क्लोरोफ्लोरोकार्बन एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर, गद्दे के फोम बनाने आदि में प्रयुक्त होते हैं| कंप्यूटर उद्योग में इनका उपयोग कंप्यूटर के पुर्जो की सफाई करने में होता है| वायुमंडल में उत्सर्जित होने पर क्लोरोफ्लोरोकार्बन अन्य गैसों के साथ मिश्रित होकर समताप मंडल में पहुंच जाते हैं| समताप मंडल में यह शक्तिशाली विकिरणों द्वारा अपघटित हो कर क्लोरीन मुक्त मूलक बनाते हैं|
इस प्रकार क्लोरीन मूलक पुनरुत्पादित होते रहते हैं और ओजोन को विखंडित करते रहते हैं| इस प्रकार ओजोन के लगातार विखंडित होने से ओजोन की सांद्रता कम हो जाती है |ओज़ोन की कम सांद्रता वाला यह क्षेत्र ओजोन छिद्र कहलाता है|
ओजोन छिद्र-
हम जानते हैं कि NO तथा CFC's के लगातार उत्सर्जन से ओजोन परत का अपक्षय हो रहा है| इसमें ओजोन की सांद्रता काफी कम हो गई है अर्थात ओजोन परत पतली हो गई है| ओज़ोन परत का कम ओजोन सांद्रता वाला यह क्षेत्र ओजोन छिद्र कहलाता है| सर्वप्रथम सन 1980 में वायुमंडलीय वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र की खोज की| अंटार्कटिका पर ओजोन छिद्र के लिए विशेष परिस्थितियां उत्तरदाई हैं|ओजोन अपक्षय की अभिक्रिया संपूर्ण समताप मंडल में होती रहती हैं |यहां रासायनिक अभिक्रिया में NO2 तथा CH4 भी भाग लेते हैं|
ओजोन अपक्षय के हानिकारक प्रभाव-
ओजोन परत के अपक्षय से अधिक से अधिक पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर आ जाएंगी जिनके निम्नलिखित हानिकारक प्रभाव हो सकते हैं-
(1) पराबैंगनी किरणों से त्वचा का जीर्णन, त्वचा कैंसर, सन बर्न आदि हो सकते हैं |
(2)पराबैंगनी किरणों से मोतियाबिंद हो सकता है |
(3)पराबैगनी किरणे पादप प्लवकों की मृत्यु का कारण बन सकती हैं जिससे मत्स्य उत्पादन में कमी आ सकती है|
(4)पराबैगनी किरण पौधों के प्रोटीनों को प्रभावित करती हैं यह इनमें हानिकारक उत्परिवर्तन भी उत्पन्न कर सकती हैं |
(5)ओजोन अपक्षय जलवायु को भी प्रभावित करता है |
(6) यह विभिन्न पारिस्थितिक तंत्र पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है|
हमारे वायुमंडल में उपस्थित महत्वपूर्ण ओजोन परत का हानिकारक गैसों के द्वारा अपक्षय होने की प्रक्रिया ओजोन परत का अपक्षय कहलाता है|
ओजोन परत पृथ्वी पर जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है परंतु हाल ही में इस सुरक्षा परत के अपक्षय की सूचनाएं हैं| इसका प्रमुख कारण मानव द्वारा वायुमंडल में लगातार ओजोन विघटनकारी पदार्थों (ODS) का छोड़ना है| नाइट्रिक ऑक्साइड तथा क्लोरोफ्लोरोकार्बन प्रमुख ओजोन विघटनकारी पदार्थ हैं|
पृथ्वी की सतह पर मनुष्यों की विभिन्न क्रियाओं जैसे जीवाश्म ईंधन का अत्यधिक प्रयोग आदि तथा प्राकृतिक स्रोतों से NO निरमुक्त होती है| साथ ही सुपर सोनिक प्लेन समताप मंडल में अत्यधिक मात्रा में NO निरमुक्त करते हैं | NO ओजोन को डाईऑक्सीजन में बदल देते हैं|
NO + O3 -----> NO2 + O2
उत्पन्न NO2 ऑक्सीजन से अभिक्रिया करके दोबारा NO बनाती है -
NO2 + O -----> NO + O2
इस प्रकार ओजोन का अपक्षय होता रहता है और NO भी पुनरुत्पादित होती रहती है|
ओजोन परत के क्षय का दूसरा कारण क्लोरोफ्लोरोकार्बन यौगिकों का उत्सर्जन है| क्लोरोफ्लोरोकार्बन एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर, गद्दे के फोम बनाने आदि में प्रयुक्त होते हैं| कंप्यूटर उद्योग में इनका उपयोग कंप्यूटर के पुर्जो की सफाई करने में होता है| वायुमंडल में उत्सर्जित होने पर क्लोरोफ्लोरोकार्बन अन्य गैसों के साथ मिश्रित होकर समताप मंडल में पहुंच जाते हैं| समताप मंडल में यह शक्तिशाली विकिरणों द्वारा अपघटित हो कर क्लोरीन मुक्त मूलक बनाते हैं|
इस प्रकार क्लोरीन मूलक पुनरुत्पादित होते रहते हैं और ओजोन को विखंडित करते रहते हैं| इस प्रकार ओजोन के लगातार विखंडित होने से ओजोन की सांद्रता कम हो जाती है |ओज़ोन की कम सांद्रता वाला यह क्षेत्र ओजोन छिद्र कहलाता है|
ओजोन छिद्र-
हम जानते हैं कि NO तथा CFC's के लगातार उत्सर्जन से ओजोन परत का अपक्षय हो रहा है| इसमें ओजोन की सांद्रता काफी कम हो गई है अर्थात ओजोन परत पतली हो गई है| ओज़ोन परत का कम ओजोन सांद्रता वाला यह क्षेत्र ओजोन छिद्र कहलाता है| सर्वप्रथम सन 1980 में वायुमंडलीय वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र की खोज की| अंटार्कटिका पर ओजोन छिद्र के लिए विशेष परिस्थितियां उत्तरदाई हैं|ओजोन अपक्षय की अभिक्रिया संपूर्ण समताप मंडल में होती रहती हैं |यहां रासायनिक अभिक्रिया में NO2 तथा CH4 भी भाग लेते हैं|
ओजोन अपक्षय के हानिकारक प्रभाव-
ओजोन परत के अपक्षय से अधिक से अधिक पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर आ जाएंगी जिनके निम्नलिखित हानिकारक प्रभाव हो सकते हैं-
(1) पराबैंगनी किरणों से त्वचा का जीर्णन, त्वचा कैंसर, सन बर्न आदि हो सकते हैं |
(2)पराबैंगनी किरणों से मोतियाबिंद हो सकता है |
(3)पराबैगनी किरणे पादप प्लवकों की मृत्यु का कारण बन सकती हैं जिससे मत्स्य उत्पादन में कमी आ सकती है|
(4)पराबैगनी किरण पौधों के प्रोटीनों को प्रभावित करती हैं यह इनमें हानिकारक उत्परिवर्तन भी उत्पन्न कर सकती हैं |
(5)ओजोन अपक्षय जलवायु को भी प्रभावित करता है |
(6) यह विभिन्न पारिस्थितिक तंत्र पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है|
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